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भारत ने वर्ष 2024-25 में एक बार फिर दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है। इस दौरान देश में 248 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) दूध का उत्पादन हुआ। लेकिन यह विशाल मात्रा आखिर जाती कहाँ है? संसद में प्रस्तुत आंकड़े इस सवाल का दिलचस्प जवाब देते हैं।
लोकसभा में केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, देश में उत्पादित कुल दूध का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा दुग्ध उत्पादक परिवार स्वयं उपभोग कर लेते हैं। यह दूध सीधे पीने के अलावा दही, घी, पनीर और अन्य पारंपरिक दुग्ध उत्पादों के रूप में इस्तेमाल होता है।
इसके बाद बचने वाला 63 प्रतिशत दूध बाजार योग्य अधिशेष (Marketable Surplus) के रूप में बाजार में आता है। हालांकि, इस अधिशेष दूध का भी पूरा हिस्सा संगठित डेयरी क्षेत्र तक नहीं पहुंचता। सरकार के अनुसार, बाजार में आने वाले दूध का केवल 32 प्रतिशत हिस्सा ही सहकारी डेयरियों और निजी संगठित डेयरी कंपनियों द्वारा खरीदा और प्रसंस्कृत किया जाता है, जबकि शेष 68 प्रतिशत दूध असंगठित क्षेत्र में ही कारोबार होता है। इसमें स्थानीय दूध विक्रेता, छोटे व्यापारी और सीधे उपभोक्ताओं को की जाने वाली बिक्री शामिल है।
यह स्थिति दर्शाती है कि भारत का दुग्ध क्षेत्र आज भी काफी हद तक पारंपरिक और असंगठित व्यवस्था पर निर्भर है। हालांकि, सरकार का लक्ष्य अधिक से अधिक दूध को संगठित डेयरी नेटवर्क से जोड़ना है ताकि किसानों को बेहतर मूल्य, गुणवत्ता आधारित भुगतान और आधुनिक सुविधाओं का लाभ मिल सके।
इसी उद्देश्य से मार्च 2026 तक देशभर में 36,283 नई डेयरी सहकारी समितियों (DCS) का गठन किया गया, जबकि 31,150 मौजूदा समितियों को सशक्त बनाया गया। गांव स्तर पर दूध संग्रहण व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 168 लाख लीटर प्रतिदिन (LLPD) की दूध शीतलीकरण क्षमता स्थापित की गई है।