भारत का NAIP: बड़ा विस्तार, लेकिन जमीनी चुनौतियां अभी भी बरकरार

Pashu Sandesh, 05 September 2026

भारत का नेशनवाइड आर्टिफिशियल इन्सेमिनेशन प्रोग्राम (NAIP) आज पशुधन नस्ल सुधार का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम बन चुका है। लेकिन अब इसकी सफलता को केवल इस आधार पर नहीं परखा जा सकता कि कितने कृत्रिम गर्भाधान (AI) किए गए। असली सवाल यह है कि इससे गर्भधारण दर, दूध उत्पादन और पशुपालकों की आय में कितना सुधार आया है।

राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत शुरू किए गए इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों के घर तक निःशुल्क AI सेवा पहुंचाना था, विशेषकर उन जिलों में जहां पहले इसकी पहुंच कम थी। विस्तार के मामले में यह योजना काफी सफल रही है। सरकार के अनुसार पिछले पांच वर्षों में 17.27 करोड़ से अधिक कृत्रिम गर्भाधान किए गए हैं और लगभग 5.98 करोड़ पशुपालकों को इसका लाभ मिला है। इसके अलावा 47,687 मैत्रियों (MAITRI) को प्रशिक्षित किया गया, 48 सीमेन स्टेशन, 24 IVF लैब तथा 28 हीफर रियरिंग सेंटर स्वीकृत किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि NAIP अब केवल एक योजना नहीं, बल्कि एक बड़े ब्रीडिंग इकोसिस्टम का हिस्सा बन चुका है।

हालांकि सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह विस्तार बेहतर परिणामों में बदल रहा है? फिलहाल तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं दिखती। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार देश में AI की सफलता दर केवल 32 से 35 प्रतिशत है। एक संसदीय समिति ने भी चिंता जताई है कि सीमेन उत्पादन की कमी, सेक्स-सॉर्टेड सीमेन की सीमित उपलब्धता और प्रशिक्षित तकनीशियनों की कमी के कारण कार्यक्रम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। समिति ने यह भी कहा कि पशुओं की औसत उत्पादकता को 5.34 किलोग्राम प्रतिदिन से बढ़ाकर 8 किलोग्राम प्रतिदिन करने का लक्ष्य हासिल करना कठिन दिखाई देता है।

समिति ने कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं। इनमें सभी सीमेन स्टेशनों पर सेक्स-सॉर्टेड सीमेन उत्पादन की सुविधा विकसित करना, पूर्वोत्तर राज्यों, लद्दाख, लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के लिए अलग सीमेन स्टेशन स्थापित करना तथा वार्षिक सीमेन उत्पादन को 11.9 करोड़ डोज़ से बढ़ाकर 20 करोड़ डोज़ तक पहुंचाना शामिल है। उद्देश्य यह है कि प्रजनन योग्य मादा पशुओं में AI कवरेज को लगभग 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 70 प्रतिशत तक किया जा सके।

राज्यों के प्रदर्शन में भी काफी अंतर दिखाई देता है। तमिलनाडु और केरल AI कवरेज के मामले में अग्रणी राज्यों में हैं। पंजाब, हरियाणा और कर्नाटक भी बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं कुछ आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा ने भी उच्च कवरेज हासिल की है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्यों में प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर या मध्यम स्तर का है। पूर्वोत्तर क्षेत्र अभी भी कार्यक्रम का सबसे कमजोर हिस्सा बना हुआ है।

विश्लेषण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिक AI कवरेज का मतलब हमेशा बेहतर परिणाम नहीं होता। आज भी हीट डिटेक्शन में त्रुटियां, तकनीशियनों की गुणवत्ता में अंतर, सीमेन हैंडलिंग की समस्याएं और समय पर गर्भ जांच की कमी जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। इसलिए किसी भी राज्य की सफलता केवल AI की संख्या से नहीं, बल्कि कन्सेप्शन रेट, कैल्विंग रेट, नस्ल सुधार और पशुपालक की आय के आधार पर मापी जानी चाहिए।

यह कहना गलत नहीं होगा कि NAIP ने देश में एक मजबूत राष्ट्रीय ब्रीडिंग प्लेटफॉर्म तैयार किया है। लेकिन अब इसके अगले चरण में केवल आंकड़ों पर नहीं, बल्कि वास्तविक परिणामों पर ध्यान देना होगा। बेहतर सीमेन उत्पादन, मजबूत प्रशिक्षण व्यवस्था, क्षेत्र-विशेष की जरूरतों के अनुरूप इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यों की जवाबदेही बढ़ाना समय की मांग है। अन्यथा यह कार्यक्रम आकार में बड़ा होने के बावजूद प्रभाव के मामले में असमान बना रह सकता है।

डॉ. आकाश वाघमारे | 9981739223