पशु संदेश, भोपाल 27 जुलाई 2026
कागज़ों में सफलता की कहानी, लेकिन गांवों में चुनौतियों का लंबा सफर
भारत ने फुट एंड माउथ डिजीज (FMD) और ब्रुसेलोसिस जैसी आर्थिक रूप से विनाशकारी बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए वर्ष 2019 में राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP) शुरू किया। सरकार का लक्ष्य स्पष्ट है—2030 तक भारत को FMD मुक्त राष्ट्र बनाना और पशुधन उत्पादकता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना। पिछले कुछ वर्षों में करोड़ों पशुओं का टीकाकरण हुआ है, लाखों पशुओं की ईयर टैगिंग की गई है और कई राज्यों में रोग प्रकोपों में कमी भी दर्ज की गई है।
लेकिन अगर इस अभियान की असली तस्वीर देखनी हो तो किसी मंत्रालय की प्रस्तुति नहीं, बल्कि किसी ब्लॉक पशु चिकित्सालय, किसी पैरावेट की मोटरसाइकिल या किसी गांव में टीकाकरण कर रही टीम के साथ एक दिन बिताना होगा। यहीं से NADCP की वास्तविक कहानी शुरू होती है।
लक्ष्य बड़े, लेकिन टीम छोटी
देश के अधिकांश राज्यों में पशुपालन विभाग वर्षों से स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं। एक पशु चिकित्सक को कई बार दर्जनों गांवों और हजारों पशुओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है। सुबह अस्पताल में पशुओं का इलाज, दोपहर में कृत्रिम गर्भाधान, शाम को टीकाकरण अभियान और रात में आपातकालीन कॉल—यह दिनचर्या सरकारी पशु चिकित्सकों के लिए सामान्य बात है।
NADCP के दौरान यही कर्मचारी अतिरिक्त जिम्मेदारी के साथ गांव-गांव पहुंचकर टीकाकरण भी करते हैं। कई राज्यों में संविदा वैक्सीनेटर और पैरावेट्स की मदद ली जाती है, लेकिन प्रशिक्षण, अनुभव और उपलब्धता हर जगह समान नहीं है।
वैक्सीन पहुंच गई, लेकिन गांव तक कैसे पहुंचे?
दिल्ली या राज्य मुख्यालय में बैठकर टीकाकरण की संख्या देखना आसान है, लेकिन किसी दूरस्थ आदिवासी गांव तक वैक्सीन पहुंचाना उतना आसान नहीं। बरसात में कच्चे रास्ते टूट जाते हैं, पहाड़ी क्षेत्रों में कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है और गर्मियों में वैक्सीन की कोल्ड चेन बनाए रखना अपने आप में चुनौती बन जाता है। कई फील्ड कर्मचारी बताते हैं कि कभी-कभी उन्हें एक दिन में 16 से 18 घंटे काम करना पड़ता है, ताकि निर्धारित लक्ष्य पूरा हो सके।
मोबाइल ऐप और नेटवर्क का संघर्ष
NADCP केवल टीकाकरण कार्यक्रम नहीं है। हर पशु की पहचान, ईयर टैगिंग और डिजिटल रिकॉर्डिंग भी इसकी अनिवार्य शर्त है। सुनने में यह आधुनिक और प्रभावी व्यवस्था लगती है, लेकिन ग्रामीण भारत की वास्तविकता अलग है। कई गांवों में मोबाइल नेटवर्क कमजोर है। फील्ड स्टाफ पहले पशु को पकड़ता है, टीका लगाता है, टैग लगाता है और फिर घंटों तक नेटवर्क तलाशता है ताकि डेटा अपलोड किया जा सके। कई कर्मचारियों का कहना है कि कभी-कभी डेटा एंट्री का काम टीकाकरण से भी ज्यादा समय ले लेता है।
पशुपालकों को समझाना सबसे कठिन काम
किसी पशु को टीका लगाना तकनीकी काम है, लेकिन पशुपालक को टीके का महत्व समझाना सामाजिक काम है। आज भी अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे पशुपालक मिल जाते हैं जो पूछते हैं—“हमारे पशु को तो कभी बीमारी नहीं हुई, फिर टीका क्यों लगवाएं?” कुछ लोग ईयर टैगिंग को लेकर संदेह जताते हैं, तो कुछ लोग पशुओं को चराई पर भेज देते हैं और टीकाकरण टीम खाली हाथ लौट आती है। कई बार एक ही गांव में दो या तीन बार जाना पड़ता है। यानी NADCP केवल पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन का भी अभियान है।
संख्या से आगे बढ़ने की जरूरत
पिछले कुछ वर्षों में टीकाकरण के आंकड़े प्रभावशाली रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल वैक्सीन लगाकर FMD मुक्त दर्जा हासिल नहीं किया जा सकता। पशुओं की आवाजाही पर निगरानी, क्वारंटीन व्यवस्था, रोग की शीघ्र पहचान, सैंपल परीक्षण, प्रयोगशाला नेटवर्क और त्वरित रिपोर्टिंग—ये सभी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना टीकाकरण। कई राज्यों में अभी भी रोग निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही है। जब तक बीमारी की हर छोटी घटना की तुरंत पहचान और रिपोर्टिंग नहीं होगी, तब तक अंतिम लक्ष्य हासिल करना कठिन रहेगा।
असली नायक कौन?
जब NADCP की उपलब्धियों की बात होती है तो अक्सर करोड़ों डोज़, लाखों टैग और बड़े बजट की चर्चा होती है। लेकिन इस अभियान की असली ताकत वे पशु चिकित्सक, पशुधन विस्तार अधिकारी, पैरावेट और वैक्सीनेटर हैं जो धूप, बारिश, कीचड़ और सीमित संसाधनों के बीच गांव-गांव पहुंचते हैं। भारत का FMD-मुक्त बनने का सपना किसी सरकारी फाइल में नहीं, बल्कि उन फील्ड कर्मचारियों के हाथों में है जो हर दिन हजारों पशुओं तक पहुंच रहे हैं। आने वाले वर्षों में यदि राज्यों को पर्याप्त मानव संसाधन, आधुनिक उपकरण, बेहतर कोल्ड चेन और मजबूत डिजिटल सहायता मिलती है, तो NADCP केवल एक सरकारी योजना नहीं बल्कि भारत के पशुधन क्षेत्र की सबसे बड़ी सफलता की कहानी बन सकता है। क्योंकि अंततः रोग नियंत्रण वैक्सीन से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से होता है जो वैक्सीन को अंतिम पशु तक पहुंचाती है। NADCP की वास्तविक सफलता वैक्सीन की शीशियों में नहीं, बल्कि उन पशु चिकित्सकों, पैरावेट कर्मियों और फील्ड स्टाफ की क्षमता में छिपी है जो देश के सबसे दूरस्थ गांव तक पहुंचकर इस अभियान को जीवित रखे हुए हैं।
Dr Akash Waghmare
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