दूध पर MSP नहीं: संसद में सरकार ने स्पष्ट किया अपना रुख

पशु संदेश, 22 जुलाई 2026

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। देश में करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से डेयरी व्यवसाय पर निर्भर है। ऐसे में दूध के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की मांग समय-समय पर उठती रही है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने लोकसभा में स्पष्ट किया है कि फिलहाल दूध के लिए MSP लागू करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।

केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने 21 जुलाई को लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि दूध की खरीद कीमतें डेयरी सहकारी समितियों और निजी डेयरी कंपनियों द्वारा प्रचलित बाजार परिस्थितियों के आधार पर तय की जाती हैं। सरकार की ओर से दूध के लिए MSP निर्धारित करने की कोई योजना नहीं है।

यह जबाब ऐसे समय आया है जब देश के कई हिस्सों में पशुपालक बढ़ती उत्पादन लागत को लेकर चिंता जता रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में पशु आहार, हरे चारे, सूखे चारे, बिजली, श्रम और पशु स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। दूसरी ओर, कई राज्यों में किसानों को मिलने वाली दूध खरीद कीमतों में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई है, जिससे लाभप्रदता पर दबाव बढ़ा है।

क्यों उठती है MSP की मांग?

कृषि क्षेत्र में MSP को किसानों के लिए मूल्य सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। गेहूं और धान जैसी फसलों के लिए MSP व्यवस्था पहले से लागू है, जिसके कारण डेयरी क्षेत्र के कुछ संगठन भी दूध के लिए न्यूनतम खरीद मूल्य की मांग करते रहे हैं। उनका तर्क है कि दूध एक दैनिक उत्पाद है और किसानों के पास इसे लंबे समय तक भंडारित करने का विकल्प नहीं होता। ऐसे में यदि बाजार में कीमतें गिरती हैं तो सबसे अधिक नुकसान उत्पादकों को उठाना पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि दूध के लिए MSP लागू करना फसलों की तुलना में कहीं अधिक जटिल मामला है। दूध एक शीघ्र नष्ट होने वाला उत्पाद है, जिसकी गुणवत्ता, वसा (Fat) और एसएनएफ (SNF) स्तर के आधार पर कीमत तय की जाती है। इसके अलावा देश में हजारों सहकारी और निजी डेयरी संस्थाएं विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग लागत संरचनाओं के साथ काम करती हैं। ऐसे में एक समान राष्ट्रीय MSP लागू करना व्यवहारिक चुनौतियां पैदा कर सकता है।

सहकारी मॉडल पर भरोसा

भारत का डेयरी क्षेत्र मुख्य रूप से सहकारी मॉडल और निजी निवेश के मिश्रण पर आधारित है। अमूल, नंदिनी, मिल्मा, सुधा, वेरका और अन्य सहकारी संस्थाएं लाखों दुग्ध उत्पादकों से सीधे दूध खरीदती हैं। अधिकांश सहकारी संस्थाएं किसानों को बाजार की स्थिति और उत्पादों की बिक्री के आधार पर भुगतान करती हैं। कई बार बेहतर बाजार परिस्थितियों में किसानों को बोनस और अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।

सरकार का वर्तमान रुख संकेत देता है कि वह मूल्य निर्धारण को बाजार आधारित व्यवस्था के तहत ही जारी रखना चाहती है। हालांकि इसके साथ यह भी अपेक्षा बढ़ गई है कि उत्पादन लागत में वृद्धि और मूल्य अस्थिरता से निपटने के लिए किसानों को अन्य प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई जाए।

आगे की राह

दूध पर MSP लागू न करने का सरकार का निर्णय डेयरी क्षेत्र में बहस को और तेज कर सकता है। एक ओर विशेषज्ञ इसे बाजार आधारित डेयरी अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त मानते हैं, वहीं किसान संगठनों का एक वर्ग मूल्य सुरक्षा की मांग जारी रख सकता है। आने वाले वर्षों में नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे किसानों को लाभकारी मूल्य, उपभोक्ताओं को उचित दर पर दूध और डेयरी उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें।

भारत की दुग्ध क्रांति का अगला चरण केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि उत्पादकों की आय को स्थिर और टिकाऊ बनाने पर निर्भर करेगा। MSP पर सरकार का ताजा रुख इसी व्यापक बहस का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन सकता है।

 

डॉ आकाश वाघमारे
9981739223

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