Pashu Sandesh, 31 July 2026
"मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में बढ़ती भूमिका के बीच NDDB के विस्तार पर उठ रहे हैं नए सवाल" इन्हीं सवालों का जबाब तलाशती हमारी यह रिपोर्ट।
भारत में डेयरी क्षेत्र को लंबे समय से सहकारिता आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता माना जाता रहा है। अमूल मॉडल से शुरू हुई श्वेत क्रांति ने देश को दूध उत्पादन में दुनिया के शीर्ष पर पहुंचाया लेकिन आज, जब भारत का डेयरी क्षेत्र नए बाजारों, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और निर्यात की संभावनाओं के दौर में प्रवेश कर रहा है, तब एक नया बदलाव भी तेजी से आकार ले रहा है।
इस बदलाव के केंद्र में है राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB)
पिछले दो वर्षों में NDDB की भूमिका केवल सलाहकार संस्था तक सीमित नहीं रही। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, असम, लद्दाख और अन्य राज्यों में डेयरी संस्थाओं के पुनर्गठन, प्रबंधन सुधार और संचालन में उसकी सक्रिय भागीदारी लगातार बढ़ी है। केंद्र सरकार और NDDB इसे सहकारी क्षेत्र के आधुनिकीकरण का प्रयास बताते हैं, जबकि आलोचक इसे डेयरी क्षेत्र के बढ़ते केंद्रीकरण के रूप में देख रहे हैं।
NDDB आखिर कर क्या रहा है?
आमतौर पर यह समझा जाता है कि NDDB राज्य डेयरी महासंघों का “टेकओवर” कर रहा है। तकनीकी रूप से यह पूरी तरह सही नहीं है। वास्तव में NDDB किसी सहकारी संस्था का कानूनी अधिग्रहण नहीं करता। इसके बजाय राज्य सरकार, डेयरी महासंघ और NDDB के बीच समझौते होते हैं, जिनके तहत संस्था को पुनर्जीवित करने, वित्तीय स्थिति सुधारने, तकनीकी उन्नयन करने और प्रबंधन को पेशेवर बनाने का काम NDDB संभालता है।
उत्तर प्रदेश में 2025 में तीन डेयरी संयंत्र और एक पशु आहार संयंत्र NDDB को दस वर्ष के लिए संचालन हेतु सौंपे गए। वहीं मध्य प्रदेश में राज्य सरकार, MPCDF और NDDB के बीच व्यापक सहयोग समझौता हुआ, जिसके तहत दूध संग्रह, प्रसंस्करण, डिजिटलीकरण और सहकारी विस्तार पर काम किया जा रहा है।
असली कहानी केवल प्रबंधन सुधार की नहीं है
डेयरी क्षेत्र से जुड़े कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल संकटग्रस्त संस्थाओं को बचाने की कवायद नहीं है।केंद्र सरकार लंबे समय से कृषि और डेयरी क्षेत्र में ऐसी संस्थाओं को मजबूत करना चाहती है जो राष्ट्रीय स्तर पर काम कर सकें। देश में अधिकांश राज्य डेयरी महासंघ अपने-अपने राज्यों तक सीमित हैं। उनकी तकनीकी क्षमता, वित्तीय स्थिति और विपणन शक्ति भी अलग-अलग है।इसके विपरीत NDDB के पास राष्ट्रीय स्तर का अनुभव, वित्तीय पहुंच, तकनीकी विशेषज्ञता और केंद्रीय समर्थन मौजूद है। ऐसे में NDDB के माध्यम से दूध संग्रह, गुणवत्ता नियंत्रण, पशु स्वास्थ्य सेवाओं, डिजिटल भुगतान और विपणन प्रणालियों को एक समान ढांचे में लाना केंद्र की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
मध्य प्रदेश बना सबसे बड़ा प्रयोगशाला
यदि किसी राज्य में इस मॉडल का सबसे बड़ा परीक्षण हो रहा है तो वह मध्य प्रदेश है। अप्रैल 2025 में हुए समझौते के बाद NDDB को राज्य के डेयरी सहकारी नेटवर्क को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई। लक्ष्य स्पष्ट था—दूध संग्रह बढ़ाना, गांवों में नई दुग्ध समितियां बनाना, डिजिटल प्रणालियां लागू करना और किसानों की आय बढ़ाना। इसके बाद कई महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दिए।दूध संग्रह प्रणाली के डिजिटलीकरण, ERP प्लेटफॉर्म के उपयोग, रीयल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग और गांव स्तर तक डिजिटल भुगतान जैसी व्यवस्थाएं लागू की गईं। राज्य में नई दुग्ध समितियों के गठन और किसानों को बेहतर भुगतान की दिशा में भी प्रयास हुए। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि राज्य NDDB की तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग करके दूध उत्पादन को दोगुना करने का लक्ष्य रखता है।
लेकिन विरोध भी कम नहीं
NDDB की बढ़ती भूमिका को लेकर सबसे बड़ी चिंता सहकारी लोकतंत्र को लेकर है।भारत में डेयरी सहकारिता की ताकत हमेशा किसानों की भागीदारी रही है। गांव की दुग्ध समिति से लेकर राज्य महासंघ तक प्रतिनिधि किसानों द्वारा चुने जाते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि जब निर्णय लेने की शक्ति पेशेवर प्रबंधकों या बाहरी संस्थाओं के हाथों में जाती है तो सहकारिता का मूल चरित्र कमजोर हो सकता है। मध्य प्रदेश में सांची ब्रांड को लेकर भी राजनीतिक विवाद सामने आया है। कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि NDDB के साथ एकीकरण के बाद सांची की स्थिति कमजोर हुई है और स्थानीय पहचान प्रभावित हो रही है। हालांकि इन आरोपों पर अलग-अलग मत हैं और सरकार व NDDB इससे सहमत नहीं हैं।
क्या केंद्र एक राष्ट्रीय डेयरी नेटवर्क बनाना चाहता है?
डेयरी क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत का फोकस केवल दूध उत्पादन बढ़ाने पर नहीं रहेगा।
अब लक्ष्य है—
इन सभी क्षेत्रों में छोटे और वित्तीय रूप से कमजोर राज्य महासंघों के लिए अकेले प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल है। यही कारण है कि NDDB को एक “राष्ट्रीय समन्वयक” की भूमिका में देखा जा रहा है, जो अलग-अलग राज्यों की क्षमताओं को जोड़कर एक मजबूत राष्ट्रीय डेयरी नेटवर्क विकसित कर सकता है।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
यदि यह मॉडल सफल रहता है तो किसानों को कई प्रत्यक्ष लाभ मिल सकते हैं—
लेकिन इसके लिए यह भी जरूरी होगा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में किसानों की भागीदारी बनी रहे और सहकारी संस्थाएं केवल प्रबंधकीय ढांचे में न बदल जाएं।
आगे क्या?
NDDB का विस्तार फिलहाल रुकने वाला नहीं दिखता। केंद्र सरकार डेयरी क्षेत्र को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानती है और आने वाले वर्षों में दूध उत्पादन, प्रसंस्करण तथा निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े निवेश की तैयारी कर रही है। ऐसे में NDDB की भूमिका और बढ़ सकती है।असल सवाल यह नहीं है कि NDDB सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या भारत एक ऐसा मॉडल विकसित कर पाएगा जिसमें आधुनिक प्रबंधन, राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और किसानों के स्वामित्व वाली सहकारिता—तीनों एक साथ कायम रह सकें। यदि इसका उत्तर ‘हाँ’ है, तो NDDB का यह दौर भारतीय डेयरी इतिहास का अगला बड़ा अध्याय साबित हो सकता है। लेकिन यदि सहकारिता की लोकतांत्रिक आत्मा कमजोर पड़ती है, तो यही प्रयोग भविष्य में विवादों का कारण भी बन सकता है। भारत की डेयरी सहकारिता आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। आने वाले कुछ वर्ष तय करेंगे कि यह परिवर्तन पुनर्जागरण कहलाएगा या केंद्रीकरण।
डॉ. आकाश वाघमारे
9981739223