Pashu Sandesh, 08 July 2022
प्रवीण पिलानिया (पीएच.डी. शोधार्थी)
पशुधन उत्पादन प्रबंधन विभाग
पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय, बीकानेर
राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर-334001
पत्राचार लेखक : praveenpilaniya1990@gmail.com
साधारणतया भारत में वर्षा ऋतु का समय जून से 15 सितम्बर तक का होता है। इस दौरान वातावरण में अधिक आद्रता होने की वजह से वातावरण के तापमान में अधिक उतार चढाव देखने को मिलता है जिसका कुप्रभाव प्रत्येक श्रेणी के पशुओं पर भी पड़ता हैं। वातावरण में आद्रता की अधिकता होने के कारण पशु की पाचन प्रक्रिया के साथ-साथ उसकी आन्तरिक रोगरोधक शक्ति पर भी असर पड़ता है परिणामस्वरूप पशु अनेक रोगों से ग्रसित हो जाता हैं। इसी मौसम के दौरान परजीवियों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि देखने को भी मिलती है जिनके द्वारा पशुओं को प्रोटोजुन एवम् पेरासिटिक रोग हो जाते हैं। इन रोगों के प्रकोप से पशु का स्वास्थय बिगड़ जाता है जिससे पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए प्रस्तुत लेख में वर्षा ऋतु के दौरान अपनाने योग्य कुछ महत्वपूर्ण बातोँ का उल्लेख किया गया है जिनका पालन करने से पशु-पालक अपने पशु संसाधन के स्वास्थ्य को बनाये रख सकते हैं। बरसात का मौसम पशु बीमारियों के लिए सबसे घातक समय होता है, पशु कीट प्रभावित घास खाने के बाद कई तरह की बीमारियों से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे जानवरों की मृत्यु भी हो सकती है| वर्षा ऋतु के समय बिमारी फैलाने वाले जीव जन्तु व कीटाणु की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है जिससे पशुओं में अनेको बिमारियों के फैलाने की संभावना बनी रहती है, इस कारण पशुपालकों को काफी नुकसान होता है| बरसात के मौसम में बीमारियों से बचाव हेतु पशुपालकों को निम्न उपाय बरतनी चाहिए-
परजीवियों के रोकथाम हेतु कीटनाशक दवाईयों का प्रयोग हर 15 दिन के अंतराल पर पशुचिकित्सक कि सलाह पर करना चाहिए| पशुशाला में धुआ करके, पशु के आसपास के मच्छरों/मक्खी आदि को दूर कर सकते हैं|
बरसात के मौसम में विभिन्न खतरनाक रोगों से बचाने के लिए उचित टीकाकरण सुनिश्चित करना चाहिए| पशुपालको को कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए जिससे पशु के स्वास्थ्य को ठीक रखा जा सके, इसके लिए इस लेख में हम कुछ बातो का उल्लेख किया जा रहा है ताकि पशुपालक अपनी कीमती पशुओं को जानलेवा बीमारी से बचा सके|
वर्षा ऋत में होने वाले मुख्य रोग-
1. खुरपका-मुँहपका रोग
खुरपका-मुँहपका रोग मुख्यतः खुर वाले पशुओं को होता है जो कि अत्यन्त संक्रामक एवं घातक विषाणुजनित रोग की श्रेणी में आता है, यह गाय, भैंस, भेंड़, बकरी, सूअर आदि पालतू पशुओं एवं हिरन आदि जंगली पशुओं को होती है, इस रोग के आने पर पशु को तेज बुखार हो जाता है, बीमार पशु के मुंह, मसूड़े, जीभ के ऊपर नीचे ओंठ के अन्दर का भाग तथा खुरों के बीच की जगह पर छोटे-छोटे दाने से उभर आते हैं, फिर धीरे-धीरे ये दाने आपस में मिलकर बड़ा छाला बना लेता है जो की बाद में जख्म का रूप लेता है, ऐसी स्थिति में पशु जुगाली करना बंद कर देता है और मुंह से लार गिरती है पशु सुस्त पड़ जाता हैं और खाना पीना छोड़ देता है खुर में जख्म होने की वजह से पशु लंगड़ाकर चलता है दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन एकदम गिर जाता है वे कमजोर होने लगते हैं गर्भवती पशुओं में गर्भपात की संभावना बनी रहती है|
उपचार एवं बचावः लाल दवा को पानी में घोल कर उससे रोगग्रस्त पशु के पैर और मुख को दिन में दो बार धोना चाहिए, इसके अलावा पैर को नीम एवं पीपल के छाले का काढ़ा बना कर दिन में दो से तीन बार धोना चाहिए प्रभावित पैरों को फिनाइल-युक्त पानी से दिन में दो-तीन बार धोकर मक्खी को दूर रखने वाली मलहम का प्रयोग करना चाहिए मुँह के छाले को 1 प्रतिशत फिटकरी अर्थात 1 ग्राम फिटकरी 100 मिलीलीटर पानी में घोलकर दिन में तीन बार धोना चाहिए प्रभावित पशु को साफ एवं हवादार स्थान पर अन्य स्वस्थ्य पशुओं से दूर रखना चाहिए प्रभावित पशु के मुँह से गिरने वाले लार एवं पैर के घाव के संसर्ग में आने वाले वस्तुओं पुआल, भूसा, घास आदि को जला देना चाहिए या जमीन में गड्ढ़ा खोदकर चूना के साथ गाड़ दिया जाना चाहिए. छः माह से उपर के स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण करवाना चाहिए तदुपरान्त 8 माह के अन्तराल पर टीकाकरण करवाते रहना चाहिए|
2. परजीवियों से होने वाले रोग-
बरसात होतें ही परजीवियों की संख्या में स्वत: अत्यधिक वृद्धि हो जाती हैं, जिससे पशुओं को शारीरिक व्याधियों का सामना करना पड़ता हैं। यह प्रायः दो प्रकार के होते है -
परजीवि दो प्रकार के होते है-
अन्तः जीवी- पेट के कीड़े, कृमि इत्यादि
ब्रह्मः जीवी- चिचड़ी, मेंज, जूं इत्यादि
पेट के कीड़े से उत्पन्न होने वाले रोग- रोग से ग्रसित पशु में दस्त,कब्ज, पानी उतरना या चक्कर आना देखने को मिलता है, पशु को पाचन प्रक्रिया में शिकायत रहती है, जिससे पतला गोबर आता है|
उपचारः गोबर की जाँच करवानी चाहिए तथा पशुचिकित्सक की सलाह से परजीवीनाशक दवा दो सप्ताह के अंतराल पर दो बार पिलानी चाहिए|
चिचड़ी रोग- चिचड़ी अनेक तरह के बीमारी के कीटाणु फैलाते हैं, यह पशु में थिलेरिया, बबेसिया व सर्रा जैसे रोग के कारण होते हैं, इसमें पशु में कमजोरी, अनिमिया एवं दूध मे कमी के लक्षण देखने को मिलता है|
उपचारः चिचड़ीयो को मारने के लिए 0.05 प्रतिशत मेलाथियान घोल का छिड़काव पशु के शरीर तथा पशुशाला में करनी चाहिए और छिडकाव सुबह जल्दी या शाम के समय करना चाहिये दोपहर में नहीं करना चाहिए, छिड़काव के बाद पशु को एक स्थान पर बाँध देना चाहिए और उसे अपने शरीर को चाटने नहीं देना चाहिए तथा मुख भाग पर छिडकाव नहीं करना है, छिड़काव करने के पहले पशु को पानी अवश्य पिलानी चाहिए|
परजीवियों रोगों से बचाने के लिए इस मौसम में पशु को जोहर किनारे नहीं ले जाना चाहिए और न ही यहाँ की घास खिलानी चाहिए|
लक्षण - रोग ग्रसित पशु में सुस्ती, कमजोरी, अनीमिया (खून की कमी) एवं दूध में कमी देखने को मिलती है। पशु को पाचन प्रक्रिया में शिकायत रहती है जिससे पेट में दर्द और पतला गोबर आता है।
उपचार-पशुचिकत्सक की सलाह से पशुओं को उनके वजन के अनुसार परजीवीनाशक दवा नियमित रूप से दो बार पिलायें।
बचाव -बारिश के मौसुम में पशुओं को जोहड़ के किनारे न लेकर जाएँ। इसके साथ-साथ जोहड़ की किनारों वाली घास न खिलाएं, क्योंकि ये घास कीड़ों के लार्वों से ग्रस्त होती है। जो की पेट में जाकर कीड़े बन जाते है और अनेक विकार उत्पन्न करते हैं।
3. गलघोंटू रोग (एच. एस)-
बारिश की वजह से पशु (मुख्यतः भैंसें) की आन्तरिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है, इस बीमारी में पशु तेज ज्वर से ग्रसित हो जाता है एवं उसके गले में सूजन भी हो जाती है, इससे साँस लेने में पशुओं को काफी तकलीफ होती है, जिससे उसकी मृत्यु, दम घुटने से हो जाती है|
उपचार एवं बचावः इस बिमारी से बचने का सबसे सर्वश्रेष्ठ उपाय पशु पालक को नजदीकी पशु चिकित्स्याल्य में जाकर अपने पशुओं को गलघोटू रोग का (मई-जून माह) में टीकाकरण करना है| अगर पशु ग्रसित हो जाए तो स्वस्थ पशुओं से अलग रखकर पशुचिकित्सक के द्वारा जितना जल्दी हो उपचार करवानी चाहिए|
4. लंगड़ा बुखार/ तीन दिवसीय बुखार-
लंगड़ा बुखार को प्रायः तीन दिवसीय बुखार भी कहा जाता है इस रोग में पशु लगातार तीन दिन तक तेज ज्वर से पीड़ित रहता है पशुओं को कमजोरी इतनी अधिक हो जाती है जिस कारण वो हमेशा बैठा ही रहता है|
उपचारः इसका सबसे आसान उपचार मीठा सोडा तथा सोडियम सैलिसिएट को बराबर भाग में पिला देना चाहिए|
5. चेचक रोग (स्माल पॉक्स)-
यह रोग मुख्यतः पशुओं के आवास में ज्यादा गन्दगी रहने के कारण होता है इसमें पशु की आयन पर लाल रंग के दाने निकल जाते हैं, इस रोग में पशुओं को तेज बुखार भी हो जाता है| इस रोग से ग्रसित होने के बाद पशुओं में रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है|
उपचार एवं बचावः पीड़ित पशु को स्वस्थ पशुओं से तुरंत अलग कर देना चाहिए| अगर पशु ग्रसित हो जाये तो सबसे पहले पोटैशियम पर्मैगनेट (लाल दवा) के घोल से संक्रमित जगह को धोये एवं उसके बाद उस जगह पर मलहम लगाने से पशुओं को आराम मिलता है|
6. चर्म रोग
इस बीमारी का मुख्य कारक भी पशुशाला में गंदगी का होना ही है। वर्षा ऋतू में गाय-भैस में चमड़ी का रोग मुख्तयः एलर्जी, फफुन्दी एवं चिचड़ के कारण होता है इसके कारण पशुओं के त्वचा पर बहुत तेज खुजलाहट होती है, जिसके फलस्वरुप त्वचा काफी मोटी होकर मुर्झा जाती है खाज खुजली से पशुओं के सारे बाल झड़ जाते हैं| कभी-कभी इन जगह पर जीवाणुओं के आश्रय से बहुत गन्दी दुर्गन्ध भी आती हैं।
उपचारः इसका उपचार पशुचिकित्सक द्वारा परीक्षण करा कर, तुरंत उपचार शुरु करवाना चाहिए|
उपरोक्त बिमारियों को ध्यान में रखने के साथ-साथ पशुपालकों को पशु प्रबंधन सम्बन्धी बातों पर भी गौर करना चाहिए जो की निम्नलिखित हैं-
1. पशुशाला की खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए तथा बिजली के पंखों का प्रयोग करना चाहियें जिससे पशुओं को उमस एवम् गर्मी से राहत मिल सकें।
2. पशुशाला में पशु के मलमूत्र के निकासी का उचित प्रबंध होना चाहियें। पशु-शाला को दिन में एक बार फिनाइल के घोल से अवश्य साफ़ करना चाहिए जिससे दुर्गन्ध फ़ैलाने वाले बैक्टीरिया का असर कम हो सकें।
3. पशु को खेतों के समीप गड्डे या जोहड़ का पानी पिलाने से परहेज करें क्योंकि इस दौरान किसान खेतों में खरपतवार एवम् कीटनाशक का इस्तमाल करतें है जो की रिसकर इन में आ जाता हैं। कोशिश करें की पशु को बाल्टी से साफ़ एवम् ताजा पानी पिलाएं।
4. पशु को हरा चारा अच्छी तरह झाड़ कर खिलाएं क्योंकि बरसात के समय घोंघों का प्रकोप अधिक होता है एवम् यह चारे के निचलें तनें एवम् पत्तियों पर चिपकें होतें हैं। घोंघें मुख्यतः फ्लूक के संरक्षक होते हैं। इसलिए पशुपालकों को सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि पशुओं का चारा घोंघों से ग्रसित न हों।
5. सरकारी अस्पताल में जाकर अपने पशुओं का मुफ्त में टीकाकरण अवश्य करवाएं जैसे गलघोंटू के टीके, खुरपका मुँहपका रोग के टीके इत्यादि।
6. परिजीविओं की रोकथाम हेतु कीटनाशक दवाइयों को पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार प्रयोग करें।
7.यदि वर्षा ऋतू में अन्य कोई विकार पशुधन में उत्पन्न होते है तो तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लेकर उपचार करें।